इंटरपोल :उम्मीद की नई किरण

सत्ता वार्ता विशेष रिपोर्ट

भारत में आर्थिक अपराधों की संख्या बीते दो दशकों में तेजी से बढ़ी है। बैंक घोटाले, मनी लॉन्ड्रिंग, हवाला लेनदेन, विदेशी निवेश की आड़ में काला धन भेजना और फिर देश छोड़कर फरार हो जाना—ये घटनाएं अब आम हो चुकी हैं। ऐसे मामलों में सबसे बड़ी चिंता यह है कि अपराधी देश से बाहर जाकर शरण ले लेते हैं और उन्हें कानून के दायरे में लाना अत्यंत कठिन हो जाता है। हालांकि इंटरपोल द्वारा हाल ही में शुरू की गई “सिल्वर नोटिस” प्रणाली से इन अपराधियों की विदेशों में जमा संपत्ति का पता लगाना आसान हो सकता है।

🔍 क्या है सिल्वर नोटिस?

इंटरपोल ने आर्थिक अपराधियों की पहचान और उनके द्वारा विदेशों में जमा किए गए धन की जानकारी के लिए “सिल्वर नोटिस” नामक एक नई प्रणाली की शुरुआत की है। इसका उद्देश्य सदस्य देशों को यह जानकारी उपलब्ध कराना है कि किसी अपराधी ने विदेश में कहाँ-कहाँ संपत्ति बनाई है और कितना धन जमा किया है। इस पहल में भारत ने भी सक्रिय भागीदारी की है और पहले ही कुछ मामलों में सूचनाएँ साझा की गई हैं।

🌐 इंटरपोल और अंतरराष्ट्रीय कानून की भूमिका

इंटरपोल दुनियाभर के पुलिस संगठनों का नेटवर्क है, जो रेड कॉर्नर नोटिस, ब्लू नोटिस, येलो नोटिस आदि के माध्यम से अपराधियों की जानकारी साझा करता है। “सिल्वर नोटिस” इस दिशा में नया कदम है, जिसका मुख्य फोकस आर्थिक अपराधियों की संपत्ति की पहचान करना है।

🧾 भारत के प्रमुख आर्थिक अपराधी

भारत में कई ऐसे हाई-प्रोफाइल आर्थिक अपराधी हैं जो अरबों रुपये के घोटालों के बाद विदेश भाग गए। उनकी सूची निम्न प्रकार है:

  1. विजय माल्या

अपराध: ₹9,000 करोड़ से अधिक का बैंक लोन फ्रॉड

देश: ब्रिटेन

स्थिति: प्रत्यर्पण की प्रक्रिया अधर में लटकी, UK अदालत ने प्रत्यर्पण को स्वीकृति दी, लेकिन कानूनी अड़चनें बनी हुई हैं।

  1. नीरव मोदी

अपराध: ₹13,000 करोड़ का PNB घोटाला

देश: ब्रिटेन

स्थिति: प्रत्यर्पण आदेश पारित, लेकिन मानवाधिकार आधारित अपीलें लंबित।

  1. मेहुल चोकसी

अपराध: नीरव मोदी का सहयोगी, ₹6,000 करोड़ का घोटाला

देश: एंटीगुआ व बारबुडा (नागरिकता ले चुका है)

स्थिति: प्रत्यर्पण प्रयास चल रहे हैं।

  1. संजय भंडारी

अपराध: रक्षा सौदों में अनियमितताएं व अवैध संपत्ति

देश: ब्रिटेन

स्थिति: रेड कॉर्नर नोटिस जारी, संपत्तियों की जानकारी आंशिक रूप से उपलब्ध।

  1. जतिन मेहता (विनसम डायमंड्स)
  2. अपराध: ₹6,500 करोड़ का बैंक घोटालादेश: सेंट किट्स एंड नेविस स्थिति: प्रत्यर्पण संधि न होने के कारण कार्रवाई बाधित।

हालांकि, सिर्फ सूचना एकत्र करने से कोई फायदा तब तक नहीं है जब तक:

इन संपत्तियों को जब्त किया जाए,

दोषियों को प्रत्यर्पित कर भारत लाया जाए,

और कानूनी प्रक्रिया तेज हो।

क्यों प्रत्यर्पण में देरी होती है?

भारत की अधिकांश प्रत्यर्पण संधियाँ जटिल कानूनी और राजनीतिक प्रक्रियाओं में उलझी रहती हैं। उदाहरण के लिए:

ब्रिटेन, जहाँ कई आर्थिक अपराधी मौजूद हैं, अक्सर मानवाधिकार या स्वास्थ्य कारणों से प्रत्यर्पण को टाल देता है।

कुछ देश जैसे एंटीगुआ या सेंट किट्स एंड नेविस, जिनकी नागरिकता अपराधियों ने खरीद ली है, कूटनीतिक दबाव के बावजूद सहयोग नहीं करते।

कई बैंकिंग गोपनीयता वाले देश, जैसे स्विट्जरलैंड, अपराधियों की गोपनीयता की रक्षा के नाम पर धन की जानकारी साझा करने से बचते हैं।

📉 क्या भारत की कार्रवाई पर्याप्त है?

भारत ने बीते वर्षों में कई अहम कदम उठाए:

Fugitive Economic Offenders Act, 2018 के तहत आर्थिक अपराधियों की संपत्तियों की जब्ती की प्रक्रिया आसान हुई।

FATF (Financial Action Task Force) के साथ समन्वय किया गया।

ED (प्रवर्तन निदेशालय) और CBI जैसी एजेंसियों ने इंटरपोल से समन्वय बढ़ाया।

लेकिन फिर भी, इन प्रक्रियाओं में काफी समय लगता है और कानूनी पेचीदगियाँ अपराधियों को समय खरीदने का मौका देती हैं।

📢 क्या समाधान हो सकता है?

  1. प्रत्यर्पण संधियों का सरलीकरण: खासकर ब्रिटेन, यूएई और कैरेबियन देशों के साथ।
  2. रियल-टाइम सूचना साझाकरण: इंटरपोल के माध्यम से संपत्ति, निवेश, पासपोर्ट स्थिति जैसी सूचनाओं की तत्काल उपलब्धता।
  3. पब्लिक ट्रैकिंग सिस्टम: सरकार एक पोर्टल पर प्रमुख आर्थिक अपराधियों की स्थिति और कानूनी प्रगति सार्वजनिक करे।
  4. दोहरे टैक्स समझौतों की समीक्षा: कई टैक्स ट्रीटियों का गलत इस्तेमाल कर धन विदेश भेजा जाता है।

🧾 निष्कर्ष

इंटरपोल की नई “सिल्वर नोटिस” पहल निश्चित रूप से एक उम्मीद की किरण है, लेकिन यह तब तक प्रभावी नहीं होगी जब तक भारत अपने कानूनी, कूटनीतिक और न्यायिक ढाँचे को और मजबूत नहीं करता। अपराधियों को केवल विदेश में खोज लेना ही पर्याप्त नहीं है, उन्हें वापस लाना और कानून के कटघरे में खड़ा करना ही असली सफलता होगी। जनता की जागरूकता, राजनीतिक इच्छाशक्ति और वैश्विक समन्वय से ही इस दिशा में बदलाव संभव है।