बिहार एवं बंगाल का मामला मात्र झांकी है।असल स्थिति वास्तविकता से काफी अलग है।

भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में चुनाव केवल राजनीतिक दलों की जंग नहीं होते, बल्कि यह नागरिकों की भागीदारी और लोकतांत्रिक मूल्यों की कसौटी भी होते हैं। मतदान प्रक्रिया की शुचिता और पारदर्शिता ही लोकतंत्र की असली ताकत है। इस प्रक्रिया का पहला और अहम चरण है – मतदाता सूची की शुद्धता। अगर मतदाता सूची ही सही न हो तो चुनाव की पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं।

मतदाता सूची दुरुस्त करने की आवश्यकता

चुनाव आयोग समय-समय पर मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण करता है। इसका मकसद होता है—

  • नए मतदाताओं को शामिल करना
  • मृत व्यक्तियों के नाम हटाना
  • स्थान परिवर्तन करने वाले लोगों का नाम सही जगह दर्ज करना

लोकसभा और विधानसभा चुनावों से पूर्व यह प्रक्रिया और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। सही मतदाता सूची के बिना न तो निष्पक्ष चुनाव संभव है और न ही लोकतंत्र की साख बची रह सकती है।

बिहार और पश्चिम बंगाल का संदर्भ : दो राज्यों की चुनौतियाँ

हाल ही में बिहार में विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण किया गया। इसका उद्देश्य नए मतदाताओं को जोड़ना और अनियमितताओं को दूर करना था। मगर इस प्रक्रिया को लेकर कई विवाद सामने आए। विपक्षी दलों ने मतदाता सूची की पारदर्शिता पर सवाल उठाए और आयोग की निष्पक्षता को चुनौती दी।
उधर, पश्चिम बंगाल में तो और गंभीर स्थिति सामने आई। तमाम सतर्कता के बावजूद यहाँ गलत तरीके से नाम जोड़ने के मामले उजागर हुए। नतीजतन चार पंजीकरण अधिकारियों सहित पाँच कर्मचारियों को निलंबित करना पड़ा और उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने के निर्देश दिए गए।

समस्या का व्यापक स्वरूप

यह केवल पश्चिम बंगाल का मसला नहीं है। समय-समय पर अन्य राज्यों से भी गलत नाम जुड़ने, मृत व्यक्तियों के नाम न हटने या दोहरी प्रविष्टियों की शिकायतें आती रहती हैं। इन गड़बड़ियों का सीधा असर चुनाव परिणामों पर पड़ सकता है और जनता का चुनाव आयोग पर विश्वास डगमगा सकता है।

चुनाव आयोग की जिम्मेदारी

निर्वाचन आयोग पर यह दायित्व है कि—

  1. सतर्कता और पारदर्शिता बढ़ाए।
  2. सूची संशोधन प्रक्रिया को तकनीकी रूप से और अधिक मजबूत बनाए।
  3. शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई करे।
  4. राजनीतिक दलों और नागरिक समाज को इस प्रक्रिया में शामिल करे।

अगर आयोग इस दिशा में कठोर कदम नहीं उठाता तो मतदाता सूची की गड़बड़ियाँ बार-बार लोकतंत्र की साख को कमजोर करेंगी।

नागरिकों और राजनीतिक दलों की भूमिका

मतदाता सूची की शुचिता सुनिश्चित करने में केवल आयोग ही नहीं, बल्कि नागरिकों और राजनीतिक दलों की भी जिम्मेदारी है

  • नागरिकों को चाहिए कि वे समय पर अपने नाम की जाँच करें और त्रुटि मिलने पर शिकायत दर्ज करें।
  • राजनीतिक दलों को चाहिए कि वे शिकायतों को तूल देने के बजाय आयोग को तथ्यात्मक जानकारी मुहैया कराएँ।

स्थिति के लिए जिम्मेदार प्रमुख कारण

  1. प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार

पंजीकरण अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा जिम्मेदारी से काम न करना।

रिश्वत, पक्षपात या राजनीतिक दबाव में गलत नाम जोड़ना और सही नाम हटाना।

  1. राजनीतिक हस्तक्षेप

राजनीतिक दल अपने हित साधने के लिए मतदाता सूची में फर्जी नाम जुड़वाने या विरोधी समुदाय के मतदाताओं के नाम हटवाने का प्रयास करते हैं।

  1. तकनीकी कमज़ोरियाँ

मैनुअल एंट्री के कारण गलतियाँ होना।

डुप्लीकेट नाम और दोहरी प्रविष्टियाँ हटाने की उचित व्यवस्था का अभाव।

  1. नागरिकों की उदासीनता

मतदाता समय पर अपने नाम और विवरण की जाँच नहीं करते।

त्रुटि मिलने पर शिकायत दर्ज कराने में लापरवाही बरतते हैं।

  1. स्थानांतरण और पलायन

काम या शिक्षा के कारण लोग एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं।

समय पर पुराने स्थान से नाम नहीं हटाया जाता, जिससे एक व्यक्ति का नाम कई सूचियों में बना रहता है।

  1. निगरानी और पारदर्शिता का अभाव

निर्वाचन आयोग के निर्देशों का जमीनी स्तर पर सही पालन न होना।

शिकायतों का समय पर न निपटाना और कार्रवाई में ढिलाई।


निदान और समाधान

  1. तकनीकी सुदृढ़ीकरण

मतदाता सूची को आधार और बायोमेट्रिक से लिंक किया जाए।

डुप्लीकेट नाम अपने आप हट सकें और गलत प्रविष्टियाँ तुरंत पकड़ में आएँ।

  1. कर्मचारियों की जवाबदेही

गड़बड़ी करने वाले अधिकारियों पर कठोर कानूनी कार्रवाई हो।

उनके काम का नियमित ऑडिट कराया जाए और पारदर्शी रिपोर्ट सार्वजनिक हो।

  1. राजनीतिक हस्तक्षेप पर रोक

चुनाव आयोग को पूरी तरह स्वतंत्र और शक्तिशाली बनाना।

किसी भी पार्टी या नेता द्वारा सूची में दबाव डालने पर सख्त दंडात्मक कार्रवाई।

  1. नागरिक जागरूकता

हर मतदाता को समय-समय पर अपने नाम की जाँच करने के लिए प्रोत्साहित करना।

ऑनलाइन और मोबाइल आधारित सेवाओं को आसान और प्रभावी बनाना।

  1. स्थानांतरण की समस्या का समाधान

पोर्टेबल वोटर आईडी सिस्टम लागू करना, जिससे स्थान बदलने पर नया पता दर्ज होते ही पुराना नाम अपने आप हट जाए।

  1. सख्त निगरानी और पारदर्शिता

सूची संशोधन प्रक्रिया की निगरानी के लिए स्वतंत्र एजेंसियाँ या नागरिक समितियाँ बनाई जाएँ।

राजनीतिक दलों और मीडिया को प्रक्रिया में शामिल कर पारदर्शिता बढ़ाई जाए।

मतदाता सूची लोकतंत्र की आधारशिला है। यदि यह ही त्रुटिपूर्ण हो तो पूरी चुनाव प्रक्रिया संदिग्ध हो जाती है। पश्चिम बंगाल की घटना ने यह साफ कर दिया है कि केवल औपचारिक पुनरीक्षण पर्याप्त नहीं है, बल्कि कड़ी निगरानी, जवाबदेही और पारदर्शिता ही मतदाता सूची की शुचिता को बनाए रख सकती है। लोकतंत्र में जनता का विश्वास तभी कायम रहेगा, जब मतदाता यह महसूस करेंगे कि उनका वोट सुरक्षित, मूल्यवान और प्रभावी है।